Bhagavad Gita: अध्याय 4, श्लोक 31

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् |
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्य: कुरुसत्तम || 31||

यज्ञशिष्टा अमृत भुजो-वे यज्ञों के अवशेषों के अमृत का पान करते हैं; यान्ति-जाते हैं; ब्रह्म-परम, सत्य; सनातन-शाश्वत; न कभी; अयम्-यह; लोकः-ग्रह; अस्ति–है; अयज्ञस्य–यज्ञ न करने वाला; कुतः-कहाँ; अन्यः-अन्य लोकों में; कुरु-सत्-तम-कुरुश्रेष्ठ, अर्जुन।

अनुवाद

BG 4.31: इन यज्ञों का रहस्य जानने वाले और इनका अनुष्ठान करने वाले, इन यज्ञों के अमृततुल्य अवशिष्टांश का आस्वादन कर परम सत्य की ओर बढ़ते हैं। हे कुरुश्रेष्ठ! जो लोग यज्ञ नहीं करते, वे न तो इस संसार में और न ही अगले जन्म में सुखी रह सकते हैं।

भाष्य

जैसा पहले उल्लेख किया गया है, यज्ञों का अनुष्ठान भगवान को प्रसन्न करने के लिए किया जाना चाहिए और इनसे प्राप्त होने वाले अवशेषों को उनका प्रसाद समझकर ग्रहण करना चाहिए। उदाहरणार्थ भगवान के भक्तगण भगवान को भोग लगाने के पश्चात् भोजन ग्रहण करते हैं। भोजन पकाने के पश्चात् उसे भगवान की प्रतिमा के सामने रखकर भगवान को इसे स्वीकार करने की प्रार्थना करते हैं। अपने मन में यह भावना धारण कर कि भगवान उनकी थाली से भोजन ग्रहण कर रहे हैं फिर वे उस थाली के अवशेषों को प्रसाद या भगवान की कृपा के रूप में सेवन करते हैं। इस प्रसाद रूपी अमृत का आस्वादन करने से ज्ञान की प्राप्ति, मन की शुद्धि और आत्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

 इसी तरह कुछ भक्त भगवान को वस्त्र अर्पित करने के पश्चात् उन्हें उनका प्रसाद मानकर उसे पहनते हैं। वे अपने घर में भगवान की मूर्ति स्थापित करते हैं और इस मनोभावना के साथ घर में निवास करते हैं कि उनका घर भगवान का मन्दिर है। जब सभी पदार्थ और कार्य भगवान को अर्पित किए जाते हैं तब उनके अवशेष या प्रसाद जीवात्मा के लिए अमृत रूपी वरदान बन जाते हैं।

परम भक्त उद्धव ने श्रीकृष्ण से कहा था

त्वयोपभुक्तस्रग्गन्धवासोऽलङ्कारचर्चिताः। 

उच्छिष्टभोजिनो दासास्तव मायां जयेमहि ।

(श्रीमद्भागवतम्-11.6.46)

 "मैं केवल वही खाऊँगा, सूचूंगा, पहनँगा, वहीं रहँगा और वही करूँगा जो पहले आपको अर्पित किया गया हो। इस प्रकार अवशेषों को आपका प्रसाद मानकर उनका सेवन कर मैं माया पर सुगमता से विजय प्राप्त कर लूंगा।" वे लोग जो यज्ञ नहीं करते, वे कर्मों के प्रतिफल से बंध जाते हैं और निरन्तर माया द्वारा प्रताड़ित होते रहते हैं।

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